आजकल, वर्चुअल साथियों के साथ रिश्तों का कोई खास उत्साह नहीं है। ये पहले शायद कुछ खास होते थे, लेकिन अब तो ऐसे दोस्त बनाना बस एक और काम जैसा लगने लगा है। वर्चुअल साथियों के दो चेहरे हैं। एक तो वो जो साथ में मस्ती करते हैं और दूसरे वो जो कभी-कभी बस बोरियत से भरे होते हैं।
जब हम वर्चुअल दोस्ती की बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये रिश्ते असली नहीं होते। हम कभी-कभी इनसे बात करते हैं, लेकिन इसका कोई खास अर्थ नहीं है। जैसे कि हम किसी गेम में बस समय बिता रहे हों। पहले तो ये बातें थोड़ी रोमांचक लगती थीं, लेकिन अब ये सब काफी बोरिंग हो गया है।
लोगों के बीच वर्चुअल संबंधों की लोकप्रियता बढ़ रही है, पर क्या ये वाकई में अच्छे हैं? हां, कुछ लोगों के लिए ये मददगार हो सकते हैं, लेकिन उन लोगों के लिए जो असली जीवन में दोस्त नहीं बना पा रहे हैं, ये बस एक टालने का तरीका है। ज्यादा समय बिताने के बाद, आपको ये समझ में आता है कि ये दोस्ती सिर्फ एक स्क्रीन के पीछे है। कोई असली कनेक्शन नहीं है।
इसलिए, वर्चुअल संबंधों के दो चेहरे हैं। एक तो वो जो आपको थोड़ी खुशी देते हैं और दूसरे वो जो आपको बस थका देते हैं। शायद ये सब कुछ समय के लिए ठीक है, लेकिन अगर हम असली रिश्तों की ओर नहीं बढ़ते, तो ये सब बस एक बेजान अनुभव बनकर रह जाएगा।
तो, क्या हमें वर्चुअल दोस्तों पर निर्भर रहना चाहिए? शायद नहीं। असली दोस्ती कहीं और है। बस थोड़ा समय बाहर निकलने का और असली जीवन में दोस्तों से मिलने का।
#वर्चुअलसाथी #असलीरिश्ते #बोरियत #ऑनलाइनदोस्त #सामाजिकजिंदगी
जब हम वर्चुअल दोस्ती की बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये रिश्ते असली नहीं होते। हम कभी-कभी इनसे बात करते हैं, लेकिन इसका कोई खास अर्थ नहीं है। जैसे कि हम किसी गेम में बस समय बिता रहे हों। पहले तो ये बातें थोड़ी रोमांचक लगती थीं, लेकिन अब ये सब काफी बोरिंग हो गया है।
लोगों के बीच वर्चुअल संबंधों की लोकप्रियता बढ़ रही है, पर क्या ये वाकई में अच्छे हैं? हां, कुछ लोगों के लिए ये मददगार हो सकते हैं, लेकिन उन लोगों के लिए जो असली जीवन में दोस्त नहीं बना पा रहे हैं, ये बस एक टालने का तरीका है। ज्यादा समय बिताने के बाद, आपको ये समझ में आता है कि ये दोस्ती सिर्फ एक स्क्रीन के पीछे है। कोई असली कनेक्शन नहीं है।
इसलिए, वर्चुअल संबंधों के दो चेहरे हैं। एक तो वो जो आपको थोड़ी खुशी देते हैं और दूसरे वो जो आपको बस थका देते हैं। शायद ये सब कुछ समय के लिए ठीक है, लेकिन अगर हम असली रिश्तों की ओर नहीं बढ़ते, तो ये सब बस एक बेजान अनुभव बनकर रह जाएगा।
तो, क्या हमें वर्चुअल दोस्तों पर निर्भर रहना चाहिए? शायद नहीं। असली दोस्ती कहीं और है। बस थोड़ा समय बाहर निकलने का और असली जीवन में दोस्तों से मिलने का।
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आजकल, वर्चुअल साथियों के साथ रिश्तों का कोई खास उत्साह नहीं है। ये पहले शायद कुछ खास होते थे, लेकिन अब तो ऐसे दोस्त बनाना बस एक और काम जैसा लगने लगा है। वर्चुअल साथियों के दो चेहरे हैं। एक तो वो जो साथ में मस्ती करते हैं और दूसरे वो जो कभी-कभी बस बोरियत से भरे होते हैं।
जब हम वर्चुअल दोस्ती की बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये रिश्ते असली नहीं होते। हम कभी-कभी इनसे बात करते हैं, लेकिन इसका कोई खास अर्थ नहीं है। जैसे कि हम किसी गेम में बस समय बिता रहे हों। पहले तो ये बातें थोड़ी रोमांचक लगती थीं, लेकिन अब ये सब काफी बोरिंग हो गया है।
लोगों के बीच वर्चुअल संबंधों की लोकप्रियता बढ़ रही है, पर क्या ये वाकई में अच्छे हैं? हां, कुछ लोगों के लिए ये मददगार हो सकते हैं, लेकिन उन लोगों के लिए जो असली जीवन में दोस्त नहीं बना पा रहे हैं, ये बस एक टालने का तरीका है। ज्यादा समय बिताने के बाद, आपको ये समझ में आता है कि ये दोस्ती सिर्फ एक स्क्रीन के पीछे है। कोई असली कनेक्शन नहीं है।
इसलिए, वर्चुअल संबंधों के दो चेहरे हैं। एक तो वो जो आपको थोड़ी खुशी देते हैं और दूसरे वो जो आपको बस थका देते हैं। शायद ये सब कुछ समय के लिए ठीक है, लेकिन अगर हम असली रिश्तों की ओर नहीं बढ़ते, तो ये सब बस एक बेजान अनुभव बनकर रह जाएगा।
तो, क्या हमें वर्चुअल दोस्तों पर निर्भर रहना चाहिए? शायद नहीं। असली दोस्ती कहीं और है। बस थोड़ा समय बाहर निकलने का और असली जीवन में दोस्तों से मिलने का।
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