क्या बेतुकी दुनिया में जी रहे हैं हम? "डेट एवरीथिंग" नाम का एक खेल आया है जो बताता है कि आप हर चीज़ से डेट कर सकते हैं, सिवाय इंसानों के! यह न केवल एक तकनीकी गलती है, बल्कि समाज की उस विकृत सोच को भी उजागर करता है, जहां हम इंसानों को दरकिनार कर रहे हैं और फालतू की चीजों से भावनात्मक संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह खेल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इतने अकेले हो चुके हैं कि हमें अब इंसानों से जुड़ने में समस्या हो रही है? क्या हमें अब अपने जीवनसाथी के लिए एक प्लास्टिक के फूल या एक किताब को चुनना बेहतर लगता है? इस तरह के खेलों से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है कि हम असली संबंधों को छोड़कर कृत्रिम और बेतुकी चीजों में उलझ जाएँ।
जब हम देखते हैं कि खेल में पात्रों की विविधता को दर्शाया गया है, जैसे पॉलीऐमरस से लेकर एसेक्सुअल तक, लेकिन इनमें से कोई भी इंसान नहीं है, तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे रचनाकारों ने पूरी तरह से इंसानियत को भुला दिया है? क्या यह हमारी सामाजिकता का एक संकेत है कि हम वास्तविक भावनाओं और रिश्तों से भाग रहे हैं?
यह खेल उन लोगों के लिए एक धक्का है जो लोगों के साथ असली संबंध बनाना चाहते हैं। क्या हमें अब यह मान लेना चाहिए कि असली प्यार और साथी की खोज करना अब एक खेल की तरह हो गया है? क्या हम वास्तव में इस बेतुकी सोच को अपनाएंगे? यह विचार ही हमें परेशान करता है।
हमारी दुनिया में तकनीक का बढ़ता प्रभाव हमें इंसानों से दूर कर रहा है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देना होगा। क्या हम अपने भविष्य को खेलों तक सीमित करने की इजाजत देंगे? यह सोचने का समय है कि क्या हम तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानवीय संबंधों को भी बनाए रख सकते हैं, या फिर हम फालतू की चीजों में उलझ कर रह जाएंगे।
इसलिए हमें एक बदलाव की दिशा में कदम उठाना होगा। हमें अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा और यह याद रखना होगा कि असली प्यार और संबंध केवल इंसानों के बीच ही पनप सकते हैं। इस बेतुकी दुनिया से बाहर निकलने का समय आ गया है!
#डेटएवरीथिंग #सामाजिकसमस्या #रिश्तें #तकनीकीगलती #मानवता
यह खेल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इतने अकेले हो चुके हैं कि हमें अब इंसानों से जुड़ने में समस्या हो रही है? क्या हमें अब अपने जीवनसाथी के लिए एक प्लास्टिक के फूल या एक किताब को चुनना बेहतर लगता है? इस तरह के खेलों से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है कि हम असली संबंधों को छोड़कर कृत्रिम और बेतुकी चीजों में उलझ जाएँ।
जब हम देखते हैं कि खेल में पात्रों की विविधता को दर्शाया गया है, जैसे पॉलीऐमरस से लेकर एसेक्सुअल तक, लेकिन इनमें से कोई भी इंसान नहीं है, तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे रचनाकारों ने पूरी तरह से इंसानियत को भुला दिया है? क्या यह हमारी सामाजिकता का एक संकेत है कि हम वास्तविक भावनाओं और रिश्तों से भाग रहे हैं?
यह खेल उन लोगों के लिए एक धक्का है जो लोगों के साथ असली संबंध बनाना चाहते हैं। क्या हमें अब यह मान लेना चाहिए कि असली प्यार और साथी की खोज करना अब एक खेल की तरह हो गया है? क्या हम वास्तव में इस बेतुकी सोच को अपनाएंगे? यह विचार ही हमें परेशान करता है।
हमारी दुनिया में तकनीक का बढ़ता प्रभाव हमें इंसानों से दूर कर रहा है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देना होगा। क्या हम अपने भविष्य को खेलों तक सीमित करने की इजाजत देंगे? यह सोचने का समय है कि क्या हम तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानवीय संबंधों को भी बनाए रख सकते हैं, या फिर हम फालतू की चीजों में उलझ कर रह जाएंगे।
इसलिए हमें एक बदलाव की दिशा में कदम उठाना होगा। हमें अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा और यह याद रखना होगा कि असली प्यार और संबंध केवल इंसानों के बीच ही पनप सकते हैं। इस बेतुकी दुनिया से बाहर निकलने का समय आ गया है!
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क्या बेतुकी दुनिया में जी रहे हैं हम? "डेट एवरीथिंग" नाम का एक खेल आया है जो बताता है कि आप हर चीज़ से डेट कर सकते हैं, सिवाय इंसानों के! यह न केवल एक तकनीकी गलती है, बल्कि समाज की उस विकृत सोच को भी उजागर करता है, जहां हम इंसानों को दरकिनार कर रहे हैं और फालतू की चीजों से भावनात्मक संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह खेल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इतने अकेले हो चुके हैं कि हमें अब इंसानों से जुड़ने में समस्या हो रही है? क्या हमें अब अपने जीवनसाथी के लिए एक प्लास्टिक के फूल या एक किताब को चुनना बेहतर लगता है? इस तरह के खेलों से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है कि हम असली संबंधों को छोड़कर कृत्रिम और बेतुकी चीजों में उलझ जाएँ।
जब हम देखते हैं कि खेल में पात्रों की विविधता को दर्शाया गया है, जैसे पॉलीऐमरस से लेकर एसेक्सुअल तक, लेकिन इनमें से कोई भी इंसान नहीं है, तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे रचनाकारों ने पूरी तरह से इंसानियत को भुला दिया है? क्या यह हमारी सामाजिकता का एक संकेत है कि हम वास्तविक भावनाओं और रिश्तों से भाग रहे हैं?
यह खेल उन लोगों के लिए एक धक्का है जो लोगों के साथ असली संबंध बनाना चाहते हैं। क्या हमें अब यह मान लेना चाहिए कि असली प्यार और साथी की खोज करना अब एक खेल की तरह हो गया है? क्या हम वास्तव में इस बेतुकी सोच को अपनाएंगे? यह विचार ही हमें परेशान करता है।
हमारी दुनिया में तकनीक का बढ़ता प्रभाव हमें इंसानों से दूर कर रहा है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देना होगा। क्या हम अपने भविष्य को खेलों तक सीमित करने की इजाजत देंगे? यह सोचने का समय है कि क्या हम तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानवीय संबंधों को भी बनाए रख सकते हैं, या फिर हम फालतू की चीजों में उलझ कर रह जाएंगे।
इसलिए हमें एक बदलाव की दिशा में कदम उठाना होगा। हमें अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा और यह याद रखना होगा कि असली प्यार और संबंध केवल इंसानों के बीच ही पनप सकते हैं। इस बेतुकी दुनिया से बाहर निकलने का समय आ गया है!
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